ज़बान की दूरी को पाटना
आज की दुनिया के ज़बानी रुझानों और मादरी ज़बान से बेरुख़ी की वजह से लोग दीनी ख़ज़ानों से दूर होते जा रहे हैं, इसलिए दीनी बेदारी पैदा करने के लिए मुख़्तसर और जामे तहरीरों और तर्जुमों की ज़रूरत है।
हम कौन हैं
स्थापना 2003 · रजि. नं. 1295। दो दशक से ज़्यादा समय से लखनऊ के बच्चों, नौजवानों और परिवारों की ख़िदमत में।
उसके नाम से, जो पाक और बुलंद है
“(ऐ सरपरस्त), कब आप हमें देखेंगे और हम आपकी ज़ियारत से मुशर्रफ़ होंगे, जब आप उसकी मदद का परचम लहरा रहे होंगे।”
— दुआ-ए-नुदबा
हमारी कहानी
इस ट्रस्ट की बुनियाद 2003 ई. में रखी गई और इसका नाम इंसानियत के आख़िरी नजात देने वाले इमाम-ए-अस्र (अ.) (हमारी जानें उन पर क़ुर्बान) के एक लक़ब पर रखा गया।
इसकी स्थापना का ख़ास मक़सद यह था कि बढ़ती उम्र के बच्चों और नौजवानों को सही तरबियत देने और उनके तालीमी मेयार को बुलंद करने की हर मुमकिन कोशिश की जाए।
तब से अल-मुअम्मल चार ज़बानों में किताबें छापने वाला इदारा बन चुका है — रजिस्टर्ड दो-माही मुअम्मल मैगज़ीन, हफ़्तावार दीनी क्लासेज़, इल्मी सेमिनार, बच्चों के मुक़ाबले और मुफ़्त मेडिकल कैंप — और इन सबके पीछे एक ही सोच है: अच्छी तरबियत पाई हुई नस्ल ऐसा समाज बनाती है जो अपने हर फ़र्द के हक़ का ख़याल रखता है।
अल-मुअम्मल क्यों
आज की दुनिया के ज़बानी रुझानों और मादरी ज़बान से बेरुख़ी की वजह से लोग दीनी ख़ज़ानों से दूर होते जा रहे हैं, इसलिए दीनी बेदारी पैदा करने के लिए मुख़्तसर और जामे तहरीरों और तर्जुमों की ज़रूरत है।
तरक़्क़ी के इस दौर में भी बहुत-सी शिया बस्तियाँ तालीमी तौर पर पिछड़ी हुई हैं और दीनी तालीम — क़ुरआन और दीनी अहकाम — से दूर हैं, क्योंकि उलमा वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। इमाम-ए-ज़माना (अ.फ़.) की इस ग़ैबत में, जहाँ तक मुमकिन हो, उनकी तालीम के लिए काम करना हमारी ज़िम्मेदारी है।
फ़ाउंडेशन के अरकान काफ़ी अरसे से दीनी-समाजी मसाइल को हल करने की कोशिश कर रहे थे। आख़िरकार हमें उन्हें मरहूम उस्ताद अल्लामा अश-शैख़ मोहम्मद हुसैन अन-नासिरी (र.), मुंबई के सामने रखने का मौक़ा मिला, जिन्होंने हमारी बहुत हौसला-अफ़ज़ाई की।
तरक़्क़ी और मज़बूती के ज़रिए
“मरहूम उस्ताद अल्लामा अश-शैख़ मोहम्मद हुसैन अन-नासिरी (र.), मुंबई की हौसला-अफ़ज़ाई से।”
“जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं उनकी मिसाल उस दाने की सी है जिससे सात बालियाँ उगें…” सूरह बक़रह, 2:261
आपकी मदद से किताबें, क्लासेज़, मेडिकल कैंप और बच्चों के प्रोग्राम चलते हैं।